Wednesday, December 06, 2006

North East Girl on a 6 year fast unto death to repeal AFSA

शर्मीला ने प्रधानमंत्री का आश्वासन ठुकराया


अनीश अहलूवालिया
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली





शर्मीला पक्के इरादे के साथ अपना आँदोलन जारी रखने का ऐलना करती हैं
पिछले छह वर्षों से भूख हड़ताल पर बैठी शर्मीला ने सेना के विशेषाधिकार क़ानून में सुधार करने के प्रधानमंत्री के आश्वासन को ठुकरा दिया है.
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में मणिपुरवासियों को आश्वासन दिया है कि वो बुनियादी मानवाधिकारों पर तलवार की तरह लटके इस क़ानून में सुधार करेंगे.

इस क़ानून के तहत सेना को किसी भी संदेहास्पद व्यक्ति को गोली मारने का अधिकार प्राप्त है.

हालाँकि 34 वर्षीय शर्मीला ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है.


मेरी मांग है कि इस क़ानून को हटाया जाए. उसमें मात्र कुछ सुधार कर देने से सुरक्षाबलों की जवाबदेही में कोई फ़र्क नहीं आएगा


शर्मीला

कहानी दरअसल यह भी नहीं है. सोचने की बात यह है कि शर्मीला के छह वर्षों के लंबे सत्याग्रह को क्या मीडिया ने उचित अहमियत दी है? क्या भारत के पूर्वोत्तर राज्य मुख्यधारा में अपनी माँग रख पाते हैं?

ईरान की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता शिरिन एबादी ने ईरोम शर्मीला से मिलने के बाद यह मसला उठाया था.

एम्स के एक वार्ड में लेटी शर्मीला की आवाज़ क्षीण हो चली है. पिछले छह सालों में अधिकांश समय उन्हें सरकारी अस्पतालों में रखा गया है जहां लगातार अनशन कर रही शर्मीला को नाक के ज़रिए जबरदस्ती तरल आहार दिया जाता है.

मगर अपने अनशन को जारी रखने के लिए वो दाँत माँजने के लिए पानी तक का इस्तेमाल नहीं करती और मौका मिलते ही नाक से नली अलग कर देती हैं.

माँग

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि वो स्पेशल पावर्स एक्ट में सुधार लाने की सोच रहे हैं मगर शर्मीला ने यह कहते हुए इसे ठुकरा दिया कि इससे कोई फ़ायदा नहीं होगा.

वो कहती हैं, "मेरी मांग है कि इस क़ानून को हटाया जाए. उसमें मात्र कुछ सुधार कर देने से सुरक्षाबलों की जवाबदेही में कोई फ़र्क नहीं आएगा."


अगर शर्मीला को कुछ हो जाता है तो मणिपुर की राजनीति में भूचाल आ जाएगा. मुख्यमंत्री ही नहीं प्रधानमंत्री की कुर्सी भी ख़तरे में आ सकती है


सामाजिक कार्यकर्ता अनिल क्षेत्रमयुन

शर्मीला ने अपने प्रतिरोध को और कड़ा करने की घोषणा करते हुए कहा है कि अब वो अपने रिश्तेदारों समेत किसी से भी बात नहीं करेंगी.

उनके सत्याग्रह की शुरुआत छह साल पहले हुई थी. दो नवंबर 2000 के दिन दस लोग कथित तौर पर सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए थे. उसके दो दिन बाद शर्मीला ने सेना को दिए विशेष अधिकारों को ख़त्म करने की मांग पर भूख हड़ताल शुरु की थी जो आज भी जारी है.

मणिपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ओनिल क्षेत्रमयुन कहते हैं कि शर्मीला मानवाधिकारों के हक़ में चरमपंथी ताकतों के विकल्प के रूप में सामने आई हैं और उन्हे कुछ हो जाता है तो मणिपुर ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा.

वो कहते हैं, "अगर शर्मीला को कुछ हो जाता है तो मणिपुर की राजनीति में भूचाल आ जाएगा. मुख्यमंत्री ही नहीं प्रधानमंत्री की कुर्सी भी ख़तरे में आ सकती है."

मीडिया की भूमिका

अब सवाल यह उठता है जब मीडिया जेसिका लाल और प्रियदर्शनी मट्टू हत्या के मामलों को एक अभियान की तरह उठा सकता है तो गांधीवादी सिद्धांतों का दामन पकड़े चल रही शर्मीला की आवाज़ नज़रअंदाज़ क्यों हो रही है.


मीडिया की रोजी रोटी मनोरंजन की दुनिया से जुड़ी या उससे प्रभावित ख़बरों से चलती है. लगे रहो मुन्नाभाई का एक बाज़ार था उसमें स्टार वैल्यू थी. लेकिन यह मीडिया के पूर्वाग्रह को भी दर्शाता है. उसे हाशिए पर जीने वाले लोगों और समुदायों में ख़ास रुचि नहीं है


सुधीश पचौरी

शर्मीला से मिलने वालों की लंबी कतार में दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा अंकिता आनंद कहती हैं," आम लोगों की तरह मीडिया भी क्षेत्रियता से प्रभावित होता है. दिल्ली में हैं तो प्रियदर्शनी मट्टू और जेसिका लाल हत्याकांड बड़ी कहानियाँ हैं. उन्हें उठाया भी जाना चाहिए मगर शर्मीला की कहानी को नज़रअंदाज़ क्यों किया जाता है?"

लोग एक सवाल और उठाते हैं. लगे रहो मुन्नाभाई जैसी फ़िल्म को लोगों और मीडिया ने यह कह कर हाथों हाथ लिया कि यह गांधी के सिद्धांतों को प्रासंगिक बना रही है लेकिन उन सिद्धांतों पर अमल का इतना कठिन और लंबा रास्ता जिस महिला ने अपनाया है, जिसका शरीर छह सालों के उपोषण में लगातार ढहता गया है उसमें मीडिया की ऐसी रूचि क्यों नहीं.

मीडिया विश्लेषक सुधीश पचौरी कहते हैं, " मीडिया की रोजी रोटी मनोरंजन की दुनिया से जुड़ी या उससे प्रभावित ख़बरों से चलती है. लगे रहो मुन्नाभाई का एक बाज़ार था उसमें स्टार वैल्यू थी. लेकिन यह मीडिया के पूर्वाग्रह को भी दर्शाता है. उसे हाशिए पर जीने वाले लोगों और समुदायों में ख़ास रुचि नहीं है."

मगर सुधीश पचौरी कहते हैं कि एक सूरत में शर्मीला की कहानी राष्ट्रीय पटल पर आ सकती थी. उनका कहना है," यहां मीडिया प्रभावशाली ग़ैर सरकारी संगठनों की सुनता है. अगर शर्मीला के पीछे ऐसा कोई संगठन खड़ा होता तो निश्चित ही वो सुर्ख़ियों में बनी रहतीं."

पक्का विश्वास

ईरोम शर्मीला के समर्थन में उनके वार्ड के बाहर खड़ी असम की कुछ छात्राओं का कहना है कि दरअसल मुख्यधारा की राजनीति में पूर्वोत्तर राज्यों के प्रति उदासीनता का लंबा इतिहास है.


मैं हमेशा आशावादी रही हूँ. ईश्वर पर मेरा पूरा विश्वास है. ईश्वर मेरे हर क़दम को देख रहा है. मेरा संघर्ष न्याय के लिए है. संघर्ष के इस दौर में मेरी समझ दिन ब दिन सुलझती गई है


शर्मीला

किसी को भले ही ऐसा लगे कि उदासीनता की अंधेरी लंबी सुरंग में वेदनादायी सफ़र तय करती शर्मीला की आवाज़ शायद थक रही है लेकिन शर्मीला कहती हैं कि उनका विश्वास पक्का है.

उनका कहना है, "मैं हमेशा आशावादी रही हूँ. ईश्वर पर मेरा पूरा विश्वास है. ईश्वर मेरे हर क़दम को देख रहा है. मेरा संघर्ष न्याय के लिए है. संघर्ष के इस दौर में मेरी समझ दिन-ब-दिन सुलझती गई है."

इन छह सालों के अनशन में शर्मीला अन्न और पानी का स्वाद भी शायद भूल चुकी हैं. कोई नहीं कह सकता कि इसका कितना गहरा असर उनके शरीर पर पड़ा होगा. लेकिन वो कई युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और सत्यमेव जयते के सिद्धांत की दुहाई देने वाले प्रशासन के लिए सिरदर्द जिसे ज़िंदा रखना उसकी मजबूरी है.

0 Comments:

Post a Comment

<< Home